Bharmaur 84 हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में 2,195 मीटर की ऊँचाई पर बसा भरमौर (प्राचीन नाम ब्रह्मपुरा) बुधिल घाटी की गोद में स्थित एक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक केंद्र है। इसे शिवभूमि और गद्देरान (गद्दी जनजाति की भूमि) के नाम से जाना जाता है। यह चंबा राज्य की प्राचीन राजधानी रहा है, जहाँ इतिहास, पौराणिक कथाएँ और हिमालय की वन्य सुंदरता अद्भुत संगम बनाती हैं।
ऐतिहासिक विरासत : Bharmaur 84 प्राचीन राजधानी से तीर्थ स्थल तक
Bharmaur 84 भरमौर का महत्व छठी शताब्दी ईस्वी से है, जब अयोध्या के राजा मेरु वर्मन ने स्थानीय राणाओं को पराजित कर यहाँ चंबा राज्य की स्थापना की। 400 वर्षों तक यह राजधानी रहा, जब तक राजा साहिल वर्मन ने 920 ईस्वी में राजधानी आधुनिक चंबा स्थानांतरित नहीं कर दी। इस स्थान का नाम देवी भरमाणी के नाम पर पड़ा, जिनकी कथा यहाँ की पहचान है। मान्यता है कि भरमौर उनका वाटिका (बगीचा) था। चौरासी मंदिर समूह और छत्रारी स्थित शिव शक्ति मंदिर (650 ईस्वी) जैसे पुरातात्विक खजाने यहाँ की प्राचीन कलात्मक विरासत के साक्षी हैं।
Bharmaur 84 आध्यात्मिक परिदृश्य: मंदिर, कथाएँ और तीर्थयात्रा
भरमौर की आध्यात्मिक छाप भगवान शिव और देवी भरमाणी से जुड़ी है:
Bharmaur 84 चौरासी मंदिर समूह :
यह 1,400 साल पुराना 84 मंदिरों का समूह हिमालय की दुर्लभ समतल भूमि पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के साथ मणिमहेश कैलाश आए 84 सिद्धों ने यहाँ तपस्या की थी।
आध्यात्मिक परिदृश्य: मंदिर, कथाएँ और तीर्थयात्रा
भरमौर की आध्यात्मिक पहचान मुख्यतः भगवान शिव और देवी भरमणी से जुड़ी हुई है। छरासी मंदिर समूह, जो लगभग 1,400 वर्ष पुराना है, यहाँ का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह दुर्लभ समतल भूमि पर स्थित 84 मंदिरों का समूह है। मान्यता है कि भगवान शिव के साथ मणिमहेश कैलाश आए 84 सिद्धों ने यहाँ तपस्या की थी।
इन 84 मंदिरों में प्रमुख मंदिरों में मणिमहेश मंदिर शामिल है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग है और यह शिखर शैली में बना है। लक्षणा देवी का मंदिर महिषासुरमर्दिनी दुर्गा को समर्पित है और इसे भरमौर का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित नरसिंह मंदिर अपनी जटिल मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। गणेश जी का मंदिर नक्काशीदार लकड़ी के स्तंभों से सजा हुआ है, जबकि नंदी बैल की धातु मूर्ति मणिमहेश मंदिर के सामने विराजमान है।
ब्रह्माणी माता मंदिर भरमौर से लगभग 4 किलोमीटर ऊपर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ जाना मणिमहेश यात्रा से पहले आवश्यक माना जाता है। सर्दियों में, विशेषकर नवंबर से मार्च तक, यहाँ भारी बर्फबारी के कारण मंदिर बंद रहता है।
मलकौता गांव के पारंपरिक लकड़ी के मकान और ब्रह्माणी माता की यात्रा
भरमौर से माता ब्रह्माणी मंदिर की ओर पैदल यात्रा के दौरान रास्ते में आने वाला मलकौता गांव यात्रियों का ध्यान अपनी विशिष्ट पारंपरिक बनावट से खींचता है। यहाँ के पुराने लकड़ी से बने मकान अपनी सुंदरता और निर्माण शैली के कारण अलग ही आकर्षण प्रस्तुत करते हैं।
इन मकानों की खासियत यह है कि निचले तल का उपयोग लोग अपने मवेशियों के लिए करते हैं, जबकि ऊपरी मंजिल को आवासीय उपयोग में लाया जाता है। हालाँकि समय के साथ कुछ लोगों ने अब कंक्रीट के पक्के मकान भी बनाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन उनकी बनावट में भी पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला की झलक आज भी देखी जा सकती है।
Bharmaur 84 भरमौर के हेलीपैड से जब ब्रह्माणी माता मंदिर की ओर चढ़ाई शुरू होती है, तो मार्ग के एक ओर फैले सेब के बगीचे और ऊँचे-ऊँचे देवदार के वृक्ष इस रास्ते की शोभा को और भी बढ़ा देते हैं। गाँव के इर्द-गिर्द आपको अखरोट, खुमानी और नाशपाती के पेड़ भी देखने को मिलेंगे, जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता को दर्शाते हैं। गाँव के एक सिरे पर स्थित हनुमान जी का छोटा सा मंदिर भी भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ प्रतिदिन सुबह और शाम पूजा-अर्चना होती है।
माता ब्रह्माणी मंदिर तक पैदल यात्रा करना चाहें तो मलकौता गांव होते हुए करीब ढाई से तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार करनी होती है। यदि वाहन से जाना हो, तो दोपहिया या चार पहिया वाहन के माध्यम से संचूई या मलकौता होकर भी मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
Manimahesh Lake : मणिमहेश झील भरमौर से 35 किलोमीटर दूर और 4,080 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह झील भगवान शिव का निवास स्थल मानी जाती है और यहाँ अगस्त-सितंबर में वार्षिक तीर्थ यात्रा आयोजित होती है। यात्री हड़सर गाँव से ट्रेक के माध्यम से यहाँ पहुँचते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य और जैवविविधता
Bharmaur 84 भरमौर का प्राकृतिक परिदृश्य अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। हड़सर गाँव, जो मणिमहेश यात्रा का प्रारंभिक बिंदु है, “झरनों का गाँव” कहलाता है। ककसेन-भागसेन झरनों को सतयुग और कलियुग के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
कुगटी वन्यजीव अभयारण्य, हिमाचल प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा अभयारण्य है, जहाँ हिमालयी काला भालू, कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ और 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। तुंडाह अभयारण्य उच्च पर्वतीय वेटलैंड्स और प्रवासी पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है।
भरमौर से पीर पंजाल और धौलाधर पर्वतमालाओं के अद्भुत दृश्य दिखाई देते हैं। इनमें मणिमहेश कैलाश शिखर (5,653 मीटर) सबसे प्रमुख है, जिसका पहला दृश्य “प्रथम कैलाश दर्शन” नामक स्थान से प्राप्त होता है।
ट्रेकिंग और रोमांच
भरमौर कई रोमांचकारी ट्रेकिंग मार्गों का आधार है। हड़सर से मणिमहेश झील तक का ट्रेक लगभग 2,200 मीटर से 4,080 मीटर तक जाता है और इसमें पवित्र झील और हिमनद दृश्य आकर्षण का केंद्र हैं। यह ट्रेक अगस्त से सितंबर के बीच तीर्थयात्रियों द्वारा प्रमुखता से किया जाता है, लेकिन जून से अक्टूबर तक अन्य यात्री भी यहाँ जाते हैं।
Kugti दर्रे का ट्रेक 5,020 मीटर की ऊँचाई तक जाता है और यहाँ वन्यजीवों के साथ-साथ गद्दी जनजातियों के गाँव देखने को मिलते हैं। वहीं, चोइबा दर्रा लगभग 4,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और यह स्पीति क्षेत्र की ओर जाने वाला मार्ग है, जो अल्पाइन घास के मैदानों से होकर गुजरता है। यह ट्रेक जुलाई से सितंबर तक सबसे उपयुक्त रहता है।
सांस्कृतिक बुनियाद: गद्दी समुदाय और परंपराएँ
Bharmaur 84 भरमौर की आत्मा यहाँ के गद्दी समुदाय में बसती है, जो अर्ध-खानाबदोश जीवनशैली अपनाते हैं। वे मौसमी प्रवास के अंतर्गत गर्मियों में भेड़-बकरियों को लेकर लाहौल-स्पीति की ऊँचाई पर जाते हैं और सर्दियों में नीचे भरमौर लौटते हैं।
गद्दी लोग अपने अतिथि सत्कार के लिए प्रसिद्ध हैं। स्थानीय घरों में आप मक्की की रोटी, दाल और पहाड़ी साग जैसे पारंपरिक व्यंजन चख सकते हैं। कुगटी गाँव पारंपरिक लकड़ी के घरों, हस्तनिर्मित ऊनी वस्त्र (जैसे पट्टू), और मेलों-जैसे मिंजर उत्सव—के ज़रिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखे हुए है।
यात्रा सुझाव :
भरमौर पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा धर्मशाला का गग्गल एयरपोर्ट (लगभग 176 किमी दूर) है। रेलवे मार्ग से यात्रा करने पर पठानकोट छावनी (180 किमी) सबसे समीप का स्टेशन है। सड़क मार्ग से चंबा (61 किमी) और डलहौजी (113 किमी) से बस या टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है।
भरमौर में रहने के लिए हिमाचल पर्यटन द्वारा संचालित ‘द गौरीकुंड’ एक बजट होटल है जो हेलिपैड के पास स्थित है। इसके अलावा, स्थानीय होमस्टे में ठहर कर गद्दी जीवनशैली का अनुभव लिया जा सकता है।
भरमौर में एक हैलीपैड भी बनाया गया है , मणिमहेश यात्रा के 2025 में इसी हेलीपैड से मणिमहेश २०२५ रेस्क्यू ऑपरेशन वायुसेना के चिनूक हेलिकॉप्टर ने बड़ी भूमिका निभाई थी । कहते हैं कि इस 2025 मणिमहेश यात्रा बीच में ही बंद करनी पड़ी क्योंकि भरमाणी माता ने ग़ुर के माध्यम से पहले ही संदेश दे दिया था ।
यहाँ यात्रा करने का सर्वोत्तम समय अप्रैल से अक्टूबर के बीच है जब मौसम सुहावना (20–30°C) होता है। दिसंबर से फरवरी के बीच भारी बर्फबारी होती है, और यह रोमांचक गतिविधियों के लिए उपयुक्त समय है।
यात्रा के दौरान जिम्मेदार पर्यटन का पालन करें — प्लास्टिक से परहेज करें, स्थानीय उत्पादों और होमस्टे को प्राथमिकता दें, और मंदिरों में आदरपूर्वक व्यवहार करें।

Bharmaur 84 भरमौर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक दिव्य और सांस्कृतिक अनुभव है। हर झरने में मानो कोई कथा बहती है, हर पर्वत किसी देवता का स्वरूप प्रतीत होता है, और यहाँ की गद्दी संस्कृति हिमालय की परंपराओं को अब तक जीवित रखे हुए है। चाहे आप छरासी मंदिर में मानसिक शांति की तलाश में हों, मणिमहेश की कठिन यात्रा पर निकलना चाहते हों, या कुगटी गाँव की पगडंडियों में खो जाना चाहते हों—भरमौर हर यात्री को आत्मिक संतोष देने वाला स्थान है।
जैसा कि एक शिवभक्त ने कहा था :
“यहाँ आकर लगता है कि जैसे भगवान के घर आ गया हूँ और सब दुख दर्द भूल गया हूँ । Bharmaur 84 भरमौर के 84 मंदिर के परिसर में छोटे छोटे बच्चों को स्कूल में आते जाते देखकर मन को बहुत सुकून मिलता है “


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