Budhi Diwali बूढ़ी दिवाली: हिमाचल प्रदेश की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा

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Budhi Diwali बूढ़ी दिवाली: हिमाचल प्रदेश की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा

Budhi Diwali परिचय

हिमाचल प्रदेश के ऊँचे पहाड़ी इलाकों में एक विशेष पर्व बड़े ही उत्साह और आनंद के साथ मनाया जाता है—Budhi Diwali (बूढ़ी दिवाली)। जहाँ भारत के अधिकांश हिस्सों में दीवाली कार्तिक माह की अमावस्या को मनाई जाती है, वहीं हिमाचल के कुछ क्षेत्रों में यह पर्व लगभग एक माह बाद अपनी सांस्कृतिक गरिमा के साथ आता है।

बूढ़ी दिवाली का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

हिमाचल की लोककथाओं के अनुसार, जब भगवान राम चौदह साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो वहाँ के लोगों ने दीपावली मनाई। पहाड़ी इलाके दुर्गम होने के कारण यह खबर यहाँ देर से पहुँची और उन्होंने भगवान राम के स्वागत के लिए ‘बूढ़ी दिवाली’ का आयोजन किया। यही वजह है कि इसे ‘पुरानी’ या ‘बूढ़ी’ दिवाली कहा जाता है।

क्षेत्रीय विविधता और मुख्य स्थान

हिमाचल के कुल्लू, सिरमौर, शिमला, मंडी और किन्नौर जिलों के गाँवों में बूढ़ी दिवाली की खास छटा देखने को मिलती है। नर्मंड, कर्सोग, सतयावली, पांजीयाली जैसे गाँव इस पर्व के प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ के ग्रामीण समुदाय कई दिन तक उत्सव में डूबे रहते हैं।

पारंपरिक अनुष्ठान और रीति-रिवाज

मशाल यात्रा (Torch Procession)

पहली रात ‘मशाल यात्रा’ (Budhi Diwali Mashal Yatra) का आयोजन होता है। गाँव के लोग देवदार और चीड़ की लकड़ियों की बनी बड़ी मशालें जलाकर, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के साथ गाँव में घूमते हैं। यह यात्रा बुराई पर अच्छाई की जीत और समाज में उजास की प्रतीक है।

भोग और प्रसाद

त्योहार के अवसर पर मंदिरों और घरों में नारियल, मिठाइयों, सूखे मेवों आदि का भोग लगाया जाता है। कई जगहों पर पूर्व में पशु बलि भी दी जाती थी, लेकिन अब इसकी जगह नारियल अर्पित किया जाता है।

लोकगीत और नृत्य

बूढ़ी दिवाली के दौरान गाँव के लोग ‘नाटी’, ‘भायुरी’, ‘स्वांग’, ‘बधेचू’ आदि लोकनृत्य करते हैं। महिलाएँ और पुरुष एक साथ गोल घेरा बनाकर घंटों तक नृत्य करते हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हैं। युद्ध का दृश्य, महाभारत की कथाएँ, एवं स्नेक डेथ से जुड़े गीत यहां खास तौर पर गाए जाते हैं।

पूरी रात की उलास और जश्न

रात भर गाँव का माहौल उल्लासमय रहता है। चिल की जली हुई लकड़ियाँ आसमान में फेंकी जाती हैं। कुछ गाँवों में लोग अग्नि रेखा पर चलते हैं, जिसे ‘शोलों पर चलना’ कहा जाता है। इसक दौरान ढोल वादन और लोकगायन वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं।

सांस्कृतिक उत्सवों में मेलों का महत्व

कई गाँवों में बूढ़ी दिवाली (Budhi Diwali) पर छोटे-छोटे मेलों का आयोजन होता है, जहाँ हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन, एवं लोककलाओं की प्रदर्शनी लगती है। यह मेले ग्रामीणों के लिए मिलन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बड़ा माध्यम बनते हैं।

भोज और हिमाचली स्वाद

त्योहार में हिमाचली व्यंजनो का भी अहम स्थान है। ‘चिवड़ा’, ‘शकुली’, ‘अखरोट’, ‘मोरां’, ‘बुडियात’ जैसी स्थानीय डिशेज़ परोसी जाती हैं। लोग मीठे-पकवानों और स्थानीय शराब/छाछ का स्वाद साथ मिलकर लेते हैं।

आध्यात्मिकता और समाज में एकजुटता

बूढ़ी दिवाली ना केवल धार्मिक आस्था, बल्कि समाज की एकता और साझीदारी का पर्व है। लोग अपने घरों को सजाते हैं, मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं और एक-दूसरे को शुभकामना देते हैं। परंपरा के अनुसार, यह पर्व गाँव में सौहार्द, मिलन और साझा कर्म का उत्सव है।

BUDHI DEEWALI आधुनिकता और पर्यटन में भूमिका

आजकल Budhi Diwali (बूढ़ी दिवाली) का महत्व बढ़ता जा रहा है। पर्यटक इस पर्व को देखने दूर-दूर से आते हैं। स्थानीय हस्तशिल्पी, कलाकार और व्यापारी अपने उत्पादों की प्रदर्शनी मेलों में लगाते हैं। पर्व के आयोजन से गाँवों की आर्थिक स्थिति पर अच्छा असर पड़ता है।

निष्कर्ष

बूढ़ी दिवाली हिमाचल की सांस्कृतिक विविधता, लोकमान्यता और एकता का अद्भुत उदाहरण है। यह पर्व इतिहास, परंपरा और अपूर्व हर्षोल्लास के साथ हर साल गाँवों में एक नया रंग भरता है ।