अजोला (Azolla) एक छोटा जलीय पौधा है। यह तेजी से बढ़ता है। यह उथले पानी की सतह पर हरे गुच्छों की तरह तैरता है। यह गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और मुर्गी के लिए सस्ता और पौष्टिक हरा चारा-पूरक बन सकता है।
हिमाचल प्रदेश जैसे इलाकों में पशुपालन घरेलू आय का बड़ा हिस्सा है। यहाँ अजोला को घर के पास छोटी क्यारी, पुराने टब, प्लास्टिक टैंक या पोखर में आसानी से उगाया जा सकता है। सर्दियों में तापमान गिरने पर इसकी बढ़वार धीमी हो जाती है। इसलिए इसे मुख्य चारा नहीं बल्कि पूरक चारा मानकर खिलाना बेहतर है।
अजोला (Azolla) क्या है?
अजोला पानी पर तैरने वाला एक छोटा जलीय फर्न है। इसकी पत्तियाँ बहुत बारीक होती हैं। यह तालाब, धान के खेत, गड्ढे या कृत्रिम क्यारी में तेजी से फैलता है।
यह पौधा हवा से नाइट्रोजन ले सकता है। इसलिए इसे जैविक खाद और पशु चारे दोनों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पशुओं के लिए यह प्रोटीन (protein), खनिज (minerals) और विटामिन (vitamins) का अच्छा पूरक माना जाता है।
गाय और भैंस के लिए अजोला क्यों उपयोगी है?
अजोला को पशुओं का सुपरफूड इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रोटीन और खनिज अच्छी मात्रा में होते हैं। इसके नियमित उपयोग से पशुओं को अतिरिक्त हरा पोषण मिल सकता है। खासकर जब घास, बरसीम या मक्का चारा पर्याप्त न हो।
इसमें विटामिन A, विटामिन B, बीटा-कैरोटीन तथा कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम और आयरन जैसे खनिज पाए जाते हैं। इसलिए दुधारू गाय-भैंस के आहार में इसे धीरे-धीरे जोड़ा जा सकता है।
अजोला के मुख्य फायदे
छोटी जगह में उगाया जा सकता है।
एक बार कल्चर लगने के बाद यह बार-बार फैलता है।
पशुओं को प्रोटीन और खनिज का अच्छा पूरक मिलता है।
गाय, भैंस, बकरी, भेड़, मुर्गी और मछली के लिए उपयोगी है।
चारे की बाहरी खरीद पर खर्च कम करने में मदद करता है।
धान के खेत में जैविक नाइट्रोजन स्रोत के रूप में भी काम आता है।
हिमाचल प्रदेश में अजोला कैसे उगाएं?
हिमाचल प्रदेश की ठंडी और नम जलवायु में अजोला उगाने के लिए ऐसी जगह चुनें जहाँ पानी स्थिर रहे। दिन में कुछ धूप भी मिले। पूरी तरह घनी छाया में इसकी बढ़वार कम हो सकती है। इसलिए आंशिक धूप वाली जगह सबसे बेहतर है।
जरूरी सामग्री
ईंट, पत्थर या लकड़ी से बनी 8 से 10 इंच ऊँची क्यारी
प्लास्टिक शीट या पुरानी टारपाल

उपजाऊ मिट्टी
2 से 3 दिन पुराना गोबर
साफ पानी
अजोला कल्चर, शुरुआत के लिए लगभग 0.5 से 1 किलो
क्यारी बनाने का तरीका
घर के पास ऐसी जगह चुनें जहाँ पानी भरना आसान हो। तेज ठंडी हवा न लगे।
लगभग 2.5 मीटर लंबी और 1.5 मीटर चौड़ी क्यारी बनाएं। इसकी ऊँचाई 8 से 10 इंच रखें।
क्यारी में प्लास्टिक शीट बिछाएं। इससे पानी रुकेगा और मिट्टी नहीं बहेगी।
ऊपर 2 से 3 इंच उपजाऊ मिट्टी फैलाएं। पत्थर, कांटे और जड़ें हटा दें।
5 से 7 किलो पुराना गोबर 10 से 15 लीटर पानी में घोलकर छान लें। इसे मिट्टी पर फैला दें।

क्यारी में 5 से 10 सेमी पानी भरें।
अब 0.5 से 1 किलो अजोला कल्चर फैला दें। हल्का पानी छिड़कें।
कितने दिन में अजोला तैयार होता है?
अनुकूल मौसम और सही देखभाल में अजोला 2 से 3 दिन में पूरी क्यारी पर फैलने लगता है। लगभग सातवें दिन से इसे तोड़कर खिलाया जा सकता है।
हर बार पूरी क्यारी खाली न करें। लगभग आधा अजोला निकालें। आधा क्यारी में छोड़ दें। इससे यह दोबारा तेजी से बढ़ेगा। लगातार चारा मिलता रहेगा।
गाय और भैंस को कितना खिलाएं?
अजोला को अकेला मुख्य चारा नहीं देना चाहिए। इसे हरे चारे और दाने के साथ पूरक के रूप में दें। ताजा पानी में धोकर दें। पशु आहार के साथ लगभग 1:1 अनुपात में मिलाएं।
शुरुआत में थोड़ी मात्रा दें। पशु को इसका स्वाद और पाचन दोनों के लिए समय मिले। धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं। पशु की सेहत, दूध और गोबर की स्थिति देखते हुए निर्णय लें।
हिमाचल प्रदेश की सर्दी में ध्यान रखें
अजोला की अच्छी बढ़वार के लिए लगभग 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। हिमाचल प्रदेश की ऊंचाई वाले गांवों में सर्दियों में तापमान इससे काफी नीचे चला जाता है। इससे उत्पादन धीमा हो सकता है।
रात में क्यारी को प्लास्टिक मल्च, पुरानी बोरी, चद्दर या नायलॉन नेट से ढकें।
गर्मी और सर्दी दोनों में सुरक्षा के लिए नायलॉन नेट का उपयोग करें।
बर्फीली हवा या जमने वाले तापमान में उत्पादन कम होना स्वाभाविक है। तब अजोला को बंद करके अन्य हरा चारा उपलब्ध रखें।
निचले और अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में यह अधिक दिनों तक अच्छा चलेगा।
अजोला की देखभाल कैसे करें?
अजोला को लगातार अच्छा बनाए रखने के लिए पानी का स्तर समान रखें। आमतौर पर 8 से 12 सेमी पानी उपयुक्त माना जाता है।

हर 10 से 15 दिन में क्यारी का 25 से 30 प्रतिशत पुराना पानी ताजा पानी से बदलें।
हर महीने थोड़ी पुरानी मिट्टी निकालकर ताजी मिट्टी डालें।
हर महीने गोबर का घोल और सुपरफॉस्फेट मिलाने से बढ़वार बेहतर हो सकती है।
हर 3 महीने में क्यारी को पूरी तरह खाली करें। साफ करें। नए सिरे से मिट्टी, गोबर, पानी और अजोला कल्चर लगाएं।
पानी में दुर्गंध, कीड़े या सड़न दिखे तो क्यारी खाली करके दोबारा शुरू करें।
किन बातों से बचें?
अजोला लाभदायक है। लेकिन गलत तरीके से इस्तेमाल करने से नुकसान हो सकता है। गंदा या दूषित पानी, अत्यधिक ठंड और बिना धोए खिलाना इसकी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
पशुओं को खिलाने से पहले अजोला को साफ पानी में धोएं।
सड़ी हुई, पीली पड़ी या दुर्गंध वाली फसल न खिलाएं।
इसे केवल पूरक चारा मानें। भूसा, दाना, हरा चारा और पानी पूरी तरह बंद न करें।

क्यारी को खुला छोड़ने से पक्षी, कीड़े या मौसम से नुकसान हो सकता है। जरूरत पर जाल लगाएं।
बहते पानी वाली जगह में अजोला न लगाएं। यह बहकर दूर चली जाएगी।
लागत और लाभ
अजोला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शुरुआती कल्चर लगने के बाद इसे बार-बार खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। एक छोटी क्यारी से भी घरेलू पशुओं के लिए नियमित हरा पूरक चारा मिल सकता है।
हिमाचल प्रदेश में जहां चारे की कमी, ऊंची जमीन और सीमित खेती आम समस्याएं हैं, वहां यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। इससे चारे की बाहरी खरीद पर खर्च घटाने और पशुओं को अतिरिक्त पोषण देने में मदद मिल सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या अजोला गाय और भैंस दोनों को खिलाया जा सकता है?
हां। अजोला गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सुअर, मुर्गी और मछली के लिए पूरक चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।
क्या इसे रोज खिलाया जा सकता है?
हां। लेकिन इसे ताजा धोकर और अन्य चारे के साथ मिलाकर देना बेहतर है। इसे अकेले मुख्य आहार न बनाएं।
क्या यह हिमाचल प्रदेश की ठंड में चलेगा?
गर्मियों और मध्यम तापमान में अच्छा चलेगा। लेकिन तेज सर्दी में बढ़वार धीमी हो जाएगी। रात में ढकना और सुरक्षित जगह चुनना जरूरी है।
इसे कहां से शुरू करें?
कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र, पशुपालन विभाग या स्थानीय प्रगतिशील किसानों से अजोला कल्चर लें। शुरुआत के लिए 0.5 से 1 किलो कल्चर पर्याप्त माना जाता है।
क्या यह दूध बढ़ाता है?
अजोला को दूध बढ़ाने वाला पूरक चारा माना जाता है। लेकिन परिणाम पशु की नस्ल, आहार, स्वास्थ्य और प्रबंधन पर निर्भर करते हैं। इसे एकमात्र उपाय न मानें।
निष्कर्ष
अजोला हिमाचल प्रदेश के छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए एक व्यावहारिक और कम लागत वाला हरा चारा-विकल्प है। सही क्यारी, साफ पानी, नियमित देखभाल और सर्दियों की सुरक्षा के साथ यह गाय-भैंस के पोषण में अच्छा योगदान दे सकता है।
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