एक अनजान पहाड़ की वो डरा देने वाली कहानी – हिप्पी हिंदुस्तानी की जुबानी

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खूबसूरत पहाड़, सन्नाटा… और डर का वो अहसास।अगर उस पल मैं पीछे न मुड़ती तो?कुछ गाँव नक्शों पर छोटे दिखते हैं, पर उनके भीतर छिपे रहस्य बहुत गहरे होते हैं।

उस गाँव के बारे में सुनी और पढ़ी बातें

मैंने उस गाँव के बारे में बहुत कुछ पढ़ और सुन रखा था । वहाँ की परम्पराएँ, रहस्यमयी किस्से, और उस जगह से जुड़ी अनकही कहानियाँ,
उसकी बेतहाशा खूबसूरती,पर उसकी दुर्गम भौगोलिक बनावट और चुनौतीपूर्ण रास्ते।

आपदा और आकर्षण के बीच झूलते उस गाँव की खूबसूरती को अपनी आँखों से देखने, महसूस करने और रहस्यों को समझने की जिज्ञासा ही मुझे वहाँ खींच लाई थी।

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गाँव में एक युवक लक्कड़ ले जाता हुआ

पहाड़ी गाँव का जीवन

गाँव घूम चुकी थी। कुछ रूढ़िवादी चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर दूँ,

तो उस गाँव में मेरा अनुभव बेहद यादगार रहा था। पहाड़ी गाँवों की तरह वह गाँव भी छोटा था, लेकिन जिंदादिल लोगों से भरा हुआ।कच्चे रास्ते,

लकड़ी और पत्थर के घर,

करीने से रखी खूब सारी सूखी लकड़ियाँ,

घर के बाहर खेलते हुए बच्चे,

धूप सेकते बतियाते हुए लोग,

और दरवाज़ों पर बैठी बुज़ुर्ग आँखें—

जो हर आने-जाने वालों को एकटक देखती

और स्नेह से हाल-चाल पूछ भर लेने से

मुस्करा उठती थीं।

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गाँव में बैठी हुई महिलाएँ बतियाते हुए

व्यू पॉइंट और झरना

लोगों ने बताया कि ऊपर एक व्यू पॉइंट है —वहाँ से पूरा गाँव दिखाई देता है और पास ही एक झरना भी है।

कौतूहलवश दुर्गम रास्तों से होते हुए, पूछते-पूछते मैं उस व्यू पॉइंट तक पहुँच गई।

पहाड़ों की गोद में अजीब-सी शांति

वहाँ का नज़ारा वाकई बेहद खूबसूरत था —

लकड़ी के पुराने नक्काशीदार घर,

दूर तक फैले देवदार के जंगल,

पास ही बहती नदी,

पहाड़ों की गोद में सिमटा वह शांत-सा गाँव,

और एक अजीब-सी शांति…

मैं वहीं खड़ी होकर पहाड़ों की खूबसूरती और उन घरों को निहारने लगी।

समय का दबाव और अकेलापन

तभी समय का अहसास होते ही मेरा सुकून और शांति थोड़ी भंग हुई —

जिस समय तक मुझे उस गाँव से लौट जाना था, उससे कहीं ज़्यादा समय हो चुका था। मुझे अपने अगले गंतव्य तक पहुँचने के लिए आधा रास्ता लिफ्ट से और फिर बस से तय करना था।

लिफ्ट मिलेगी या नहीं…

कहीं अंधेरा न हो जाए…

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पहाड़ का खूबसूरत view point

वो आख़िरी वीडियो

ये ख्याल आते ही मैंने फटाफट मोबाइल निकाला, ताकि उस जगह की कुछ यादें सहेज सकूँ।

उस वक्त मैं वहाँ बिल्कुल अकेली थी। हवा की सरसराहट के अलावा और कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी और न ही कोई दिखाई दे रहा था।

“बस ये आख़िरी वीडियो…

इसके बाद तुरंत निकलूँगी।”

पीछे किसी के होने का अहसास

लेकिन तभी…

बिना किसी आहट के…

मुझे अचानक अहसास हुआ कि मेरे पीछे कोई है।

मैंने सिर घुमाकर चारों तरफ़ सरसरी निगाहों से जायज़ा लिया।

वहाँ सिर्फ़ पेड़ थे। मेरे अलावा और कोई भी नहीं।

“वहम है…

अकेलेपन का डर और कुछ नहीं,”

जब डर हकीकत बन गया

धड़कनें अचानक तेज़ हो गईं और साँसें अटक सी गईं।

मेरे ठीक पीछे एक लड़का खड़ा था —

उम्र यही कोई 18 से 22 साल।

मैं जिस जगह खड़ी थी, वहाँ से बस ज़रा-सा भी धक्का लगता,

तो मैं सीधे खाई में गिर सकती थी। मेरी नज़र उसके चेहरे से सरकती हुई उसकी आँखों पर जाकर ठहर गई।

अजीब-सी…

लाल…

जैसे कई रातों से सोया न हो,

या किसी गहरे नशे में हो,

उनमें कुछ अजीब-सा महसूस हुआ, जिसने मेरे डर को और ज़्यादा बढ़ा दिया।

मेरे अचानक पीछे मुड़ने की वजह से वह थोड़ा ठिठका,

लेकिन उसकी नज़रें मेरे चेहरे पर गड़ी रहीं।


दिमाग़ ने कुछ ही सेकंड में इशारा किया —

यहाँ से निकलो।

अभी।

लेकिन…

मैंने पूरी कोशिश की कि मेरे चेहरे पर खौफ न दिखे।

मैंने खुद को सामान्य बनाए रखा और अपने डर को ज़ाहिर नहीं होने दिया, ताकि उसे यह अहसास न हो कि मैं उसे देखकर डर गई हूँ या पैनिक कर रही हूँ।

ये सोचकर कि मेरा पैनिक होना उसे हिंसक या और निडर बना सकता है। मैं मोबाइल जल्दी से बैग में डालते हुए तेज़ क़दमों से गाँव की तरफ़ उतरने लगी।

वो भी तेज़ क़दमों से मेरे पीछे आने लगा।

चलते-चलते ही लगभग हाँफते हुए

मैंने पूछा —

“क्या हुआ भैया,

मेरे पीछे क्यों आ रहे हैं आप?”

और फिर…

मैं उस ढलान वाली पहाड़ी पर दौड़ने लगी।

मुझे पता था —

ढलान पर मेरी स्पीड पर मेरा कंट्रोल नहीं रहेगा। गिरूँगी तो बुरी तरह चोट लगेगी या फिर लुढ़कते हुए किसी खाई में जा गिरूँगी। लेकिन मेरा पीछा कर रहे उस साये का खौफ इतना था

कि चोट का डर उसके सामने बौना पड़ गया।

जैसे-जैसे नीचे घर क़रीब आने लगे,

लोगों की मौजूदगी दिखने लगी।

उसकी रफ़्तार धीमी पड़ गई।

थोड़ा सुरक्षित महसूस करते ही, पता नहीं मुझे क्या सूझा,

मैं ठिठक गई —

मैंने मोबाइल निकाला और उसकी वीडियो बनाने लगी।

चेहरा साफ़ नहीं आया। वीडियो बनाते देख वो वहीं जम-सा गया।

नीचे बच्चों का शोर सुनाई देने लगा। लोग दिखे।

तो मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई।

लेकिन वहाँ से निकलने के बाद भी…

पूरे रास्ते ज़हन में सवालों का तूफ़ान था।

वो मेरा पीछा क्यों कर रहा था ?

कबसे ?

और कहाँ से ?

“अगर मैं उस पल पीछे न मुड़ती तो ?”

दूर से तो मेरे कपड़ों और हुलिए से

यह अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल था

कि मैं एक लड़की हूँ…

फिर वो मेरे पीछे क्यों आया?

जब पहली बार मुझे किसी के होने का अहसास हुआ था…

और पीछे देखने पर कुछ नहीं दिखा…

क्या वह वाकई पेड़ों के पीछे छिप गया था ?

वो इलाका नशे के लिए भी जाना जाता है …

क्या वो नशे में था…

या फिर वह उस पहाड़ का कोई ऐसा राज था

जिसे मैं खुशनसीबी से पीछे छोड़ आई ?

या फिर…

बस एक बात का सुकून है —

मैं समय रहते वहाँ से निकल आई। वरना उस व्यू पॉइंट की वो ‘अजीब-सी शांति’ शायद हमेशा के लिए मेरी पहचान बन जाती।


About the Author

मैं प्रियंका मौर्या हूँ, जिसे लोग सोशल मीडिया पर ‘Hippie Hindustani’ के नाम से जानते हैं। मैं एक सोलो और स्लो ट्रैवलर, कंटेंट क्रिएटर और स्टोरीटेलर हूँ, जो भारत के गाँवों, पहाड़ों और यात्रा के दौरान मिलने वाले लोगों, उनकी कहानियाँ और अपने अनुभव साझा करती हूँ।यात्राओं के ज़रिए मेरा मकसद न केवल भारत की छुपी हुई खूबसूरती और स्थानीय संस्कृति को दुनिया के सामने लाना है, बल्कि खुद को और अपनी सीमाओं को पहचानने का एक ज़रिया भी है।मेरे लिए यात्रा का मतलब सिर्फ डेस्टिनेशन या तस्वीरें खींचना नहीं है, बल्कि सुकून से वहाँ की मिट्टी, संस्कृति और आतिथ्य को महसूस करना, दुनिया को अपनी नज़र से देखना, समझना और अनुभवों को संजोकर दुनिया के सामने रखना है।

मैं विदेशी सैलानियों को भी, ‘अतिथि देवो भव:’ की सच्ची भावना के साथ असल भारत, यहाँ की संस्कृति और आतिथ्य का अनुभव कराने में मदद करती हूँ। मेरा मकसद उन्हें हमारे देश की उस आत्मीयता से रूबरू कराना है, जिसे वे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर अनुभव नहीं कर पाते।

यात्राओं के साथ-साथ मैं सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हूँ। मैं ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, पर्यावरण स्वच्छता, महिलाओं की सुरक्षा और ‘पीरियड हाइजीन’ (माहवारी स्वच्छता) के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास करती हूँ।

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