Jagra Mela खर्शाली जागरा उत्सव – हिमाचल की लोक परंपरा, आस्था और संस्कृति का पर्व

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खर्शाली जागरा उत्सव: हिमाचल की लोक-संस्कृति, आस्था और एकता का पर्व

खर्शाली जागरा उत्सव हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय ग्रामीण अंचल का एक दिव्य लोक पर्व है, जिसे हर वर्ष भादों मास (सितंबर) के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को बड़े उल्लास, श्रद्धा और सामूहिकता के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि गांव की एकता, पारंपरिक लोक-संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामाजिक संबंधों को मजबूती देने का एक अवसर भी बनता है।

खर्शाली क्षेत्र और जागरा उत्सव का ऐतिहासिक महत्व

खर्शाली हिमाचल प्रदेश के शिमला, सिरमौर तथा किन्नौर जिले के ग्रामीण इलाकों से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। जागरा उत्सव खास तौर पर महासू देवता, देशमोलिया देवता आदि की पूजा के लिए मनाया जाता है। इसमें बारह से ज्यादा गांवों के हजारों लोग सम्मिलित होते हैं। जागरा पर्व की जड़ें सदियों पुरानी हैं, जब ग्रामीण समाज अपने आराध्य देवताओं के आशीर्वाद के लिए सामूहिक रूप से एकत्र होते थे।

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खर्शाली जागरा उत्सव 2024-के रंग: मशालों की चमक, लोक धुनें और ग्रामीण उमंग की झलक।

उत्सव की शुरुआत: माहौल और तैयारी

पर्व की पूर्व संध्या पर गांव के लोग मंदिर और सार्वजनिक स्थानों को साफ-सजाते हैं। उत्सव पांच सितंबर से एक हफ्ते तक चलता है, जिसमें रात के समय विशेष पूजा, लोक-धुनों और मशालों की रश्म शुरू होती है। देवता की प्रतिमा को स्नान करवा कर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं।

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प्रमुख अनुष्ठान और रात्रि जागरण

रात्रि जागरण (जागरा) महोत्सव की सबसे अहम परंपरा है। लोग रात भर अपने आराध्य देवता का कीर्तन करते हैं, पारंपरिक ढोल-नगाड़ों, बांसुरी और शहनाई की धुन पर ‘तू बरमा न जाए विरसुए’ जैसे विशेष गीत गाए जाते हैं। देवता के गुरों द्वारा विशेष नृत्य किया जाता है, जिसमें देवता का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है। हाथ में जलती मशालें लेकर देवता महाराज का सामूहिक अभिनंदन किया जाता है, जिससे वातावरण मंत्रमुग्ध और दिव्य महसूस होता है।

लोक गीत, नृत्य और सांस्कृतिक विविधता

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खर्शाली जागरा उत्सव के दौरान देवता शोभायात्रा और भक्तों की उमंग — लोक आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम।

इस उत्सव में शराचली क्षेत्र के दर्जनों गांवों के लोग उपस्थित रहते हैं। लोक गीतों और सामूहिक नृत्य के माध्यम से गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और मंगल कामना की प्रार्थना की जाती है। महिलाएं पारंपरिक धुनों पर थिरकती हैं, बच्चों के लिए पारंपरिक खेल और प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। ग्रामीण कलाकार अपने हाथों से बनी वस्तुओं, हस्तशिल्प व घरेलू उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं। यह अवसर धार्मिक भक्तिभाव के साथ स्थानीय कारोबार और कला-संस्कृति के संरक्षण के लिए भी अहम है।

देवी-देवताओं की शोभायात्रा और आशीर्वाद

जागरा पर्व में देवता देशमोलिया, देवता महाराज क्यांलू समेत अन्य क्षेत्रीय देवी-देवताओं की प्रतिमा की शोभायात्रा विशेष आकर्षण है। वजीर, गुर, पुजारियों द्वारा देवताओं के स्वरूप का अभिनंदन किया जाता है, जिससे सामाजिक नेतृत्व और पारंपरिक नियमों का पालन होता है। हर गांव अपने देवता के नाम से जागरा उत्सव का आयोजन करता है, जिसमें ग्रामीणों की पूर्ण सहभागिता होती है।

जागरा उत्सव 2023: खर्शाली क्षेत्र में लोक-संस्कृति, नृत्य और जलती मशालों के बीच उत्साह की झलकी।

भोग, प्रसाद और सामाजिक एकता

महासू देवता का आशीर्वाद पाने के लिए ग्रामीण पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं और सामूहिक भोग का आयोजन करते हैं। ‘पण रोटी’, ‘सिड्डू’, ‘काले चने’ जैसे स्थानीय व्यंजनों की खुशबू पूरे गांव में फैल जाती है। सामूहिक भोज और प्रसाद वितरण से सामाजिक संबंध और स्नेह में वृद्धि होती है।

पर्यावरण और शिक्षा का संदेश

पर्व में साफ-सफाई, वृक्षारोपण और पानी के स्रोतों की रक्षा जैसी ग्रामीण जीवन की मूल बातों का पालन किया जाता है। बच्चों को पुरानी कथाएं, लोकगीत और संस्कृति सिखाई जाती है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहें। प्रकृति के प्रति सम्मान और सहभागिता इस पर्व की भव्यता को और बढ़ाते हैं।

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पर्यटन के नए आयाम

अब यह उत्सव स्थानीय ही नहीं, बल्कि हिमाचल में बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। सरकार व पर्यटन विभाग जागरा उत्सव को संस्कृति पर्यटन से जोड़कर स्थानीय लोगों को रोजगार और क्षेत्रीय बाजार को नए अवसर प्रदान कर रहे हैं। बाहर से आने वालों को गांव की संस्कृति, रहन-सहन और पर्व का हिस्सा बनने का अवसर मिलता है।

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निष्कर्ष: जागरा पर्व की दिव्यता

खर्शाली जागरा उत्सव हिमाचल के पहाड़ों की आत्मा, लोक जीवन, धार्मिक आस्था, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकता का अद्वितीय उदाहरण है। हर वर्ष रहस्य, श्रद्धा और संस्कृति से गूंथी यह रात ग्रामीण समाज को नई ऊर्जा, फसल की आशा और आपसी प्रेम का संदेश देती है। जागरा न केवल एक धार्मिक समारोह, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही हिमाचली विरासत का सच्चा प्रतीक है।