Khundi Mata Yatra Chamba Trek | खुंडी माता यात्रा 2026: माही की कहानी

 

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खुंडी माता यात्रा: माही की कहानी

चांजू से खुंडी माता झील तक — एक पहाड़ी बेटी के सफर की सच्ची दास्तान

नमस्ते, मैं माही। मैं आपको वो कहानी सुनाने जा रही हूं जो मैंने खुद जी है — खुंडी माता यात्रा की कहानी। ये कोई आम ट्रेक नहीं है, ये तो जैसे पहाड़ों ने मुझे अपनी बांहों में लेकर एक पुराना किस्सा सुनाया हो। अगर आप भी चंबा के चूड़ाह घाटी में बसी इस अनदेखी, अनछुई यात्रा के बारे में जानना चाहते हैं, तो मेरे साथ चलिए — कदम दर कदम, ठीक वैसे ही जैसे मैंने चला था।

Khundi Mata Yatra Dates 2026(खुंडी माता यात्रा 2026): चंबा की प्रसिद्ध खुंडी माता (खुंडी मराली माता) यात्रा 2026 को लेकर श्रद्धालुओं में उत्सुकता बनी हुई है। फिलहाल 2026 की यात्रा की तारीख की कोई स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि जिला प्रशासन, मंदिर प्रबंधन या अन्य आधिकारिक माध्यम से उपलब्ध नहीं है। सोशल मीडिया पर 18 अगस्त 2026 की तारीख का उल्लेख जरूर मिल रहा है, लेकिन इसे अभी आधिकारिक तारीख नहीं माना जाना चाहिए। पिछले वर्षों में यह पारंपरिक जातर अगस्त माह में आयोजित होती रही है और 2025 में तीन दिवसीय खुंडी माता मराली जातर का समापन 19 अगस्त को हुआ था। इसलिए 2026 में यात्रा की सही तारीख के लिए आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना उचित है। तारीख, यात्रा मार्ग और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं की आधिकारिक जानकारी सामने आते ही इस अपडेट को संशोधित किया जाएगा।

Khundi Mata Chamba History (खुंडी माता कौन हैं?)

चांजू गांव पहुंचने से पहले मुझे भी नहीं पता था कि खुंडी माता असल में कौन हैं। गांव के एक बुज़ुर्ग ने चाय पिलाते हुए बताया — खुंडी माता, माता काली का ही एक रूप हैं, जिन्हें गद्दी समुदाय और तीसा घाटी के लोग सदियों से पूजते आए हैं। “खुंडी” शब्द गद्दी भाषा के “खुंड” से आया है, यानी वो खूंटा जिससे गाय-भैंस बांधी जाती है।

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बुज़ुर्ग ने आंखें बंद करके कहा — “बेटा, ये सिर्फ देवी नहीं, हमारी कुलदेवी हैं। हर गद्दी परिवार का दुख-सुख इनसे जुड़ा है।”

यहां हर साल एक बड़ा मेला लगता है, जिसे जातर कहते हैं। उस दिन कुछ लोगों पर देवी का चेला बनकर आना और परंपरा के अनुसार बलि चढ़ाना, यहां की सदियों पुरानी रीत है — जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

यात्रा पर कब निकलूं मैं?

मैंने बहुत पूछताछ की, तब जाकर पता चला — असली जातर भादो महीने के कृष्ण पक्ष के पहले मंगलवार को होती है, यानी लगभग अगस्त में। ये मणिमहेश यात्रा से कुछ हफ्ते पहले पड़ता है। 2024 में करीब 12,000 श्रद्धालु इस तीन दिन की यात्रा में शामिल हुए थे — मैं भी उन्हीं में एक बूंद थी।

सबसे अच्छा समय: मध्य अगस्त से सितंबर की शुरुआत तक
बचें: जुलाई की बारिश में (रास्ता कट सकता है) और अक्टूबर से मई तक (बर्फ जमी रहती है)

How to reach Khundi Mata Trek ?वहां तक पहुंचूं कैसे?

खुंडी माता झील समुद्र तल से 3,750 मीटर ऊंचाई पर, पीर पंजाल की पहाड़ियों में, चंबा जिले के चूड़ाह तहसील में बसी है। सड़क का आखिरी छोर चांजू गांव है, जो तीसा-पठानकोट रोड पर नकरोड़ से होते हुए आता है।

  • रेल से: पठानकोट (चांजू से करीब 180 किमी)
  • हवाई मार्ग से: कांगड़ा-गग्गल एयरपोर्ट (करीब 200 किमी)
  • सड़क से: चंबा (85 किमी), डलहौज़ी (115 किमी) या पठानकोट (180 किमी) से नकरोड़ होते हुए चांजू

मैं पठानकोट से बस पकड़कर नकरोड़ पहुंची, वहां से एक लोकल गाड़ी में ठसाठस भरकर चांजू का आखिरी पड़ाव तय किया। खिड़की से बाहर झांकते हुए पहाड़ जैसे मुझसे कह रहे थे — “अब तू हमारी दुनिया में आ चुकी है।”

Khundi Mata Trek Four Routes : चार रास्ते, चार कहानियां

खुंडी माता तक पहुंचने के चार पुराने रास्ते हैं, जो गद्दी चरवाहों ने अपने मवेशी चराने के लिए बनाए थे।

रास्ताशुरुआतकठिनाईखासियत
चांजू रूटचांजू गांव (नकरोड़ होकर)सामान्यसबसे लोकप्रिय, कोई ऊंचा दर्रा नहीं, कुल 9 किमी (5 किमी रियाली तक, 4 किमी झील तक)
साहो रूटसाहो (चंबा होकर)कठिनऊंचे दर्रे वाला रास्ता, चंबा के पीछे के गांवों से
लिह्ल/भेज रूटलिह्ल/भेज (चंबा-भरमौर मार्ग)कठिनछोटी घाटियों से, भरमौर के पास
चौरासी छल्ली रूटथल्ला गांव क्षेत्रसबसे कठिन84 नालों के नाम पर, भरमौर-लूणा के गद्दियों का रास्ता

मैंने पहली बार जाने वालों की तरह चांजू रूट (Chanju Route)ही चुना — और आपको भी यही सलाह दूंगी।

मेरा असली सफर, दिन-ब-दिन

पहली शाम: चांजू गांव (2,000 मी)

चांजू (Chanju sea level height -2000 meters)पहुंचकर मुझे लगा जैसे मैं किसी पुरानी कहानी की किताब में आ गई हूं। यहां हिंदू और गुज्जर मुस्लिम परिवार साथ रहते हैं, घर पहाड़ी ढलान में बने हैं, छतें मिट्टी की। गांव के मुहाने पर एक पुराना पत्थर का कुंड और काली माता (मराली रूप में) व शिव जी का मंदिर है। मंदिर के लकड़ी के पैनल पर नौ दुर्गा उकेरी हुई हैं, और यहां के पुजारी की वंशावली 300 साल पुरानी बताई जाती है।

मंदिर के सामने बड़े मैदान में शाम को लंगर बन रहा था। धुएं की खुशबू, चूल्हे की आंच, और आसपास बैठे यात्रियों की बातें — मुझे लगा जैसे मैं यहीं की हूं।

“बेटा, यहां किसी से पैसे मत मांगना, ये तो देवी का प्रसाद है” — चांजू के एक घर की दादी ने मुझसे कहा जब मैंने ठहरने का किराया पूछा।

Day1 Khundi Mata Trek-पहला दिन: चांजू से रियाली (5 किमी)

सुबह जल्दी निकली। रास्ता घने जंगल से होकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है। दांतुइन गांव के आखिरी मिट्टी वाले घरों को पार करते ही असली जंगल शुरू हुआ — चीड़, देवदार, चेस्टनट और हिमालयी मेपल के पेड़ों के बीच चांजू नाला मेरे साथ-साथ बहता रहा। रास्ते में 20 से ज्यादा छोटे-बड़े झरने मिले, हर एक पर मैं दो मिनट रुककर सांस लेती।

देवथल नाले के संगम पर पुल कभी-कभी बारिश में बह जाता है — मुझे भी वहां पत्थरों पर संभलकर पार करना पड़ा। थोड़ा डर लगा, पर पीछे से आ रहे एक गद्दी चरवाहे ने हाथ थाम लिया।

रियाली पहुंची तो शाम ढल रही थी। यहां एक छोटा मंदिर है जहां जंगली बकरों के सींग चढ़ाए हुए हैं, और एक लंबी लकड़ी की धर्मशाला। किसी ने चाय-मैगी का अस्थायी ठेला लगाया हुआ था। यात्रा से पहले ये घास के मैदान पीले जंगली फूलों से भर जाते हैं — मैं देखकर ठिठक गई।

Khundi-Mata-Yatra
Khundi Mata Lake View

Day 2 Khundi Mata Trek -दूसरा दिन: रियाली से खुंडी माता झील (4 किमी)

ये दिन छोटा था पर चढ़ाई ज्यादा। घना जंगल पीछे छूटा, आगे खुले मैदान और खड़ी चट्टानें आईं, जहां से झरने गिर रहे थे। एक जगह रास्ता संकरा हो गया और मुझे बड़े-बड़े पत्थरों पर कूद-कूदकर पार करना पड़ा, नीचे बर्फीला पानी बह रहा था।

फिर एक पतली, रीढ़ जैसी चढ़ाई आई — घास और पत्थरों के बीच से। जैसे ही ऊपर पहुंची, सामने एक गहरा कटोरे जैसा मैदान खुला — यहीं यात्री अपने तंबू लगाते हैं। जातर के समय यही सुनसान जगह सैकड़ों तंबुओं, लंगर और चाय की दुकानों से जगमगा उठती है।

और फिर सामने आई वो झील — Khundi Mata Lake -खुंडी माता झील। हल्के नीले पानी में हिमालय की रोशनी झिलमिला रही थी। मैं कुछ पल के लिए बस खड़ी रह गई, कुछ बोल ही नहीं पाई।

झील के किनारे एक ऊंचाई पर पत्थर का छोटा मंदिर है, लाल चुनरियों से लिपटा हुआ, चारों तरफ त्रिशूल टिके हुए। ठीक सामने एक पहाड़ी चोटी बीच से फटी हुई है, जिसमें से ग्लेशियर का बर्फीला मलबा गिरता रहता है — मानो खुद माता काली की उग्र शक्ति वहां जमी हो।

मणिमहेश के उलट, यहां सिर्फ चेला बनने वाले ही झील में स्नान करते हैं, आम यात्री नहीं। मैंने मंदिर में माथा टेका, दक्षिणावर्त परिक्रमा की और वहीं मैदान में बैठकर गद्दी पुजारियों को अपनी भेड़-बकरियां चराते देखती रही।

भादो महीने के पहले मंगलवार को जब लिह्ल, साहो और चांजू से जातर की टोलियां एक साथ पहुंचती हैं, तब कोई बुज़ुर्ग गद्दी पुजारी माता के आवेश में आता है — धूप, घंटियों और भजनों के बीच ये पल देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

ज्यादातर यात्री उसी दिन लौट जाते हैं, कुछ एक रात और रुककर उतरते हैं। मैंने भी वहीं एक रात और रुककर तारों तले सोने का फैसला किया।

Khundi Mata Yatra Trek Gears – मैंने अपने बैग में क्या-क्या रखा

ज़रूरी सामान:

  • गर्म कपड़े (रात में तापमान बहुत गिर जाता है)
  • बारिश से बचने वाली जैकेट और ट्रेकिंग पैंट
  • अच्छी पकड़ वाले मजबूत ट्रेकिंग जूते (रास्ता गीला और फिसलन भरा है)
  • 30-40 लीटर का बैकपैक, रेनकवर के साथ
  • स्लीपिंग बैग (अगर टेंट में रुकना हो; धर्मशाला में बुनियादी छत मिल जाती है)
  • हेडलैंप या टॉर्च
  • फर्स्ट-एड किट, पेट और दर्द की दवाइयां
  • सनस्क्रीन, धूप का चश्मा, लिप बाम
  • पानी की बोतल (2-3 लीटर)
  • सूखे मेवे, एनर्जी बार जैसे नाश्ते
  • नकद पैसे (यहां एटीएम नहीं है, छोटे नोट रखें लंगर और चाय के लिए)

Important Tips for Khundi Mata Yatra -काम की चीज़ें, अगर साथ ले जाएं तो अच्छा:

  • ट्रेकिंग पोल (नाला पार करने और उतराई में मदद करता है)
  • कैमरा और एक्स्ट्रा बैटरी
  • पावर बैंक
  • कचरे के लिए प्लास्टिक बैग (पहाड़ को साफ रखें)

कुछ बातें जो मैं आपको ज़रूर बताना चाहूंगी

Route of Khundi Yatra Trek रास्ता: ये पगडंडियां प्रशासन ने नहीं बनाईं, ग्रामीणों ने बरसों में बनाई हैं। बारिश के मौसम में कहीं-कहीं ये गायब भी हो जाती हैं। जंगल में भालू और जंगली जानवर भी मिल सकते हैं।

Khundi-Mata-Yatra
Khundi Dal Lake

Khundi Mata Sea level Height -ऊंचाई: 3,750 मीटर बहुत ज्यादा नहीं है, पर फिर भी शरीर को समय दें। चांजू में एक रात रुककर ही आगे बढ़ें। सिरदर्द, जी मिचलाना या चक्कर महसूस हो तो रुक जाएं।

मोबाइल नेटवर्क: चांजू के बाद कहीं भी नेटवर्क नहीं मिलता। घर पर अपना पूरा प्लान बताकर ही निकलें।

परमिट: भारतीय नागरिकों को जातर के दौरान किसी खास परमिट की ज़रूरत नहीं। विदेशी यात्री मौजूदा नियम पहले से जांच लें।

यहां के रीति-रिवाज़ का सम्मान करें:
• मंदिर में शालीन कपड़े पहनें
• पुजारी या रस्मों की फोटो लेने से पहले इजाज़त लें
• कचरा न फैलाएं, अपना कचरा वापस साथ लाएं
• झील और मंदिर की पवित्रता का ध्यान रखें

Khundi Marali Mata Story-यहां की दो पुरानी कहानियां जो मैंने रास्ते में सुनीं

चांजू में एक बुज़ुर्ग ने मुझे दो किस्से सुनाए, जो सदियों से यहां चले आ रहे हैं:

  1. Khundi Mata Old Cow Story -बूढ़ी गाय की कहानी: एक बूढ़ी औरत की सूखी गाय एक पत्थर को चाटने लगी, और अचानक उसमें दूध उतर आया। वही पत्थर आज चांजू मंदिर में शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। उस औरत को सपने में पता चला कि ये जगह खुद माता काली की शक्ति से भरी है।
  2. गुम हुई बच्ची की कहानी: एक 8 साल की बच्ची चांजू से झील की तरफ चली गई और कभी वापस नहीं लौटी। लोग मानते हैं कि वो खुद देवी का ही एक रूप बन गई। हर साल जातर में उसी की याद में भजन-कीर्तन होता है।

चौरासी छल्ली रास्ते का नाम 84 नालों की वजह से पड़ा — कहते हैं पांडवों ने यहां 84 सिद्धों के लिए पूजा की थी, और भीम ने पानी के लिए 84 झरने बनाए।

खुंडी माता बनाम मणिमहेश यात्रा

बातखुंडी माता यात्रामणिमहेश यात्रा
ऊंचाई3,750 मीकरीब 4,080 मी
कुल दूरी18 किमी (चांजू रूट, आना-जाना)26 किमी (हड़सर से, आना-जाना)
भीड़करीब 12,000 (2024)4 लाख से ज्यादा
कठिनाईसामान्य (चांजू रूट पर कोई ऊंचा दर्रा नहीं)सामान्य से कठिन
मुख्य आस्थागद्दी चरवाहे, काली पूजाशिव पूजा, बड़े स्तर पर हिंदू आस्था
समयभादो के कृष्ण पक्ष का पहला मंगलवार (अगस्त)भादो महीना (अगस्त-सितंबर)

मणिमहेश की भारी भीड़ के मुकाबले, खुंडी माता की यात्रा एक शांत, अपनी सी और कम भीड़ वाली यात्रा है — जैसे किसी अपने के घर जाना हो।

New Way of Khundi Trek -अब रास्ता थोड़ा आसान हो रहा है

2024 में चूड़ाह प्रशासन ने दांतुइन से खुंडी माता तक पक्का रास्ता बनाने की योजना बनाई, ताकि श्रद्धालुओं को आसानी हो। रास्ते में लंगर की सुविधाएं भी अब पहले से बेहतर हो गई हैं।

Khundi Yatra Trek FAQs

क्या खुंडी माता ट्रेक शुरुआती लोगों के लिए सही है?
हां, चांजू रूट से बिल्कुल। सही तैयारी के साथ ये सामान्य कठिनाई का ट्रेक है, कोई ऊंचा दर्रा पार नहीं करना पड़ता।
खुंडी माता जाने का सही समय क्या है?
मध्य अगस्त से सितंबर की शुरुआत, खासकर भादो के पहले मंगलवार की जातर के दौरान।
चांजू गांव कैसे पहुंचें?
पठानकोट या चंबा से नकरोड़ (चंबा से 60 किमी) आएं, फिर वहां से लोकल बस या शेयर टैक्सी से चांजू (नकरोड़ से 30 किमी)।
रास्ते में रुकने की सुविधा है क्या?
हां, चांजू, रियाली और झील के पास मुफ्त धर्मशालाएं हैं। अपना टेंट भी ले जा सकते हैं।
क्या रास्ते में मोबाइल नेटवर्क मिलता है?
नहीं, चांजू के बाद कोई नेटवर्क नहीं है। निकलने से पहले घर पर पूरी जानकारी दे दें।
क्या परमिट चाहिए?
भारतीय नागरिकों के लिए जातर के दौरान किसी खास परमिट की ज़रूरत नहीं। विदेशी यात्री नियम पहले से जांच लें।
कुल ट्रेक दूरी कितनी है?
चांजू रूट पर 18 किमी आना-जाना (एक तरफ की दूरी 9 किमी)।
जय माता दी! मैं माही, वापस लौट आई हूं — पर पहाड़ों की वो झील, वो टूटी हुई चोटी, वो लाल चुनरियों वाला मंदिर, अब भी मेरी आंखों में बसा है। अगर आप भी किसी सच्ची, अनछुई, आस्था और पहाड़ों से भरी यात्रा की तलाश में हैं, तो अगस्त में अपना बैग बांधिए और खुंडी माता की तरफ निकल पड़िए। मेरी तरह, आप भी वापस लौटकर पहले जैसे नहीं रहेंगे।

 

हिमाचल के दूर-दराज़ इलाकों के लिए ऑफलाइन नेविगेशन

अगर आप किसी ट्रेक, झरने, कैंपिंग साइट, पर्वतीय दर्रे, mountain road, bike route या हिमाचल की किसी दूर-दराज़ जगह पर जा रहे हैं, तो यात्रा शुरू करने से पहले Organic Maps ऐप डाउनलोड करें और संबंधित क्षेत्र का Offline Map अपने मोबाइल में सेव कर लें।

इंटरनेट या mobile network उपलब्ध न होने पर भी आप अपनी live GPS location देख सकते हैं। यदि आपके route के लिए GPX track उपलब्ध हो, तो उसे Organic Maps में import करके आप सही रास्ते पर बने रह सकते हैं।

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यात्रा सुझाव:

  • यात्रा शुरू करने से पहले संबंधित क्षेत्र का offline map डाउनलोड करें।
  • Mountain roads और remote areas में mobile network पर पूरी तरह निर्भर न रहें।
  • मोबाइल पूरी तरह चार्ज रखें और power bank साथ रखें।
  • यदि GPX track उपलब्ध हो, तो उसे Organic Maps में import करके ही यात्रा शुरू करें।

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