Kullu Dussehra Mela

Kullu Dussehra international Mela 300 से ज़्यादा देवी-देवताओं का आशीर्वाद

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Kullu Dussehra Mela : कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में मनाया जाने वाला एक भव्य, सप्ताहभर चलने वाला उत्सव है, जो अपनी अनूठी उत्पत्ति, सामाजिक-सांस्कृतिक गहराई और निरंतर विरासत के कारण भारत के सबसे प्रसिद्ध दशहरा आयोजनों में से एक है। नीचे इस उत्सव का एक विस्तृत विवरण दिया गया है जिसमें इसका इतिहास, अनुष्ठान, महत्व, स्थानीय देवताओं की भूमिका, सामुदायिक भागीदारी, वर्षों में हुए परिवर्तन, और भारत की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा में इसका स्थान शामिल है।

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध और गहराई से पूजित Kullu Dussehra Mela (कुल्लू दशहरा ) हर अक्टूबर में पूरे कुल्लू घाटी को श्रद्धा, रंग और परंपरा के जीवंत केंद्र में बदल देता है। 4 से 5 लाख से अधिक लोग—स्थानीय निवासी, पर्यटक और देश-विदेश से आए अतिथि—ढालपुर मैदान में एकत्रित होते हैं, जिससे यह प्राचीन और आधुनिक भारत के बीच एक अनूठा सांस्कृतिक सेतु बन जाता है। भारत के अन्य हिस्सों में जहाँ दशहरा के दिन रावण का दहन किया जाता है, वहीं कुल्लू में यह पर्व दिव्य झांकियों, शोभायात्राओं और पारंपरिक अनुष्ठानों से घाटी को आलोकित कर देता है।

 

कुल्लू दशहरे (Kullu Dussehra Mela ) की जड़ें 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी हैं। कथा के अनुसार, राजा ने एक गरीब ब्राह्मण दुर्गा दत्त से मोतियों का कटोरा मांग लिया। जब ब्राह्मण ने असमर्थता जताई, तो राजा के अन्यायपूर्ण आदेश से दुखी होकर दुर्गा दत्त ने अपने परिवार सहित आत्मदाह कर लिया और राजा को श्राप दे दिया। अपराधबोध और मानसिक यातना से ग्रस्त राजा ने प्रायश्चित का मार्ग चुना। साधुओं और पुजारियों के मार्गदर्शन में वे अयोध्या गए और वर्षों के तप के बाद भगवान रघुनाथ (भगवान राम का स्वरूप) की मूर्ति कुल्लू लाए।

Kullu Dussehra Mela

राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ को कुल्लू का अधिपति घोषित किया और स्वयं को उनके अधीन माना। इसी से कुल्लू दशहरे की परंपरा की शुरुआत हुई—एक ऐसा पर्व जो युद्ध या विनाश नहीं, बल्कि श्रद्धा, क्षमा और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।

 

कुल्लू दशहरा भारत के अन्य स्थानों की तरह विजयदशमी पर समाप्त नहीं होता, बल्कि उसी दिन से आरंभ होकर सात दिनों तक चलता है। पहला दिन भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा से शुरू होता है, जिसमें सजे-धजे रथ पर भगवान की मूर्ति रखी जाती है और ढालपुर मैदान में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

इस उत्सव की सबसे अनूठी बात है—घाटी के अलग-अलग गाँवों से 300 से अधिक देवताओं की सहभागिता। ये देवता अपने-अपने गाँवों के संरक्षक माने जाते हैं और भक्तजन उन्हें पालकियों में लेकर आते हैं। ड्रम, नगाड़े और शंखनाद के साथ पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह की गूंज फैल जाती है।

 

इन देवताओं (जिन्हें स्थानीय रूप से देवता और देवियाँ कहा जाता है) का आगमन इस बात का प्रतीक है कि वे अपने पर्वतीय निवास छोड़कर भगवान रघुनाथ से मिलने आए हैं। प्रत्येक देवता की अपनी कथा, परंपरा और नियम होते हैं। सजाई गई पालकियों (रथों) को भक्त कंधों पर उठाकर लाते हैं—यह दृश्य पूरे पर्व को रंगों और ऊर्जा से भर देता है।

Kullu Dussehra Mela

इन्हीं शोभायात्राओं में कुल्लू घाटी की मौखिक परंपराएँ और लोककथाएँ जीवंत होती हैं। पहाड़ी लोकसंगीत, नृत्य और कहानी कहने की परंपराएँ इन दिनों अपने चरम पर होती हैं, जिससे यह संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहती है।

अनुष्ठान, बलि और Kullu Dussehra Mela आध्यात्मिक महत्व

कुल्लू दशहरे की एक विशिष्ट प्रथा “बलि” की है, जो देवी हिडिम्बा को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। यह प्रतीकात्मक बलि होती है जिसमें भैंसे की बलि दी जाती थी। देवी को समर्पित यह अनुष्ठान घाटी की रक्षा और शांति के लिए किया जाता है। बाद में यह मांस समुदाय में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, जो एकता और कृतज्ञता का प्रतीक है।

प्रत्येक दिन पूजा, आरती, भंडारे और मेले का आयोजन होता है। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रामायण आधारित लोकनाट्य, पहाड़ी नृत्य और गीत प्रस्तुत किए जाते हैं, जो स्थानीय और विदेशी दर्शकों दोनों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

 

ढालपुर मैदान दशहरा उत्सव का हृदय स्थल है। पहले दिन यहाँ भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा होती है, जिसे देखने के लिए विशाल भीड़ उमड़ पड़ती है। मैदान में सांस्कृतिक दल, लोकनर्तक, कलाकार और कारीगर अपने उत्पाद—कुल्लू शॉल, टोपियाँ और लकड़ी के हस्तशिल्प—प्रदर्शित करते हैं। यह स्थल भक्ति, कला और उत्सव का संगम बन जाता है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता एक साथ झिलमिलाती हैं।

 

 

कुल्लू दशहरा Kullu Dussehra Mela केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता का जीवंत उदाहरण भी है। इस पर्व के दौरान कुल्लू घाटी का प्रत्येक गाँव, चाहे वह ऊँचाई पर स्थित हो या नदी किनारे, किसी न किसी रूप में भाग लेता है। ग्रामीण अपने स्थानीय देवताओं के साथ रथ यात्रा में सम्मिलित होते हैं, जबकि नगरवासी मैदान में व्यवस्था, भोजन, और आवास की सेवाओं में सहयोग देते हैं।

इस दौरान सामाजिक भेदभाव, जातिगत सीमाएँ या आर्थिक अंतर गौण हो जाते हैं। हर व्यक्ति “भगवान रघुनाथ के सेवक” के रूप में एक समान भूमिका निभाता है। यह समरसता ही कुल्लू दशहरे की आत्मा है, जो पीढ़ियों से समाज को एक सूत्र में बाँधती आई है।

महिलाएँ भी इस पर्व में विशेष रूप से शामिल होती हैं—वे घरों में पूजा की तैयारी करती हैं, पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर नृत्य प्रस्तुत करती हैं और सामूहिक भजन-कीर्तन का संचालन करती हैं। बच्चों के लिए मेले का आकर्षण अलग ही होता है—झूले, मिठाइयाँ, खिलौने और पारंपरिक खेलों की रौनक उनकी दुनिया को रंगीन बना देती है।

सांस्कृतिक प्रस्तुति और Kullu Dussehra Mela लोककला का संरक्षण

कुल्लू दशहरे के दौरान होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थानीय कलाकारों के लिए अपनी कला प्रदर्शित करने का मंच प्रदान करते हैं। पारंपरिक नृत्य जैसे “नाटी” पूरे उत्सव का अभिन्न हिस्सा हैं। नाटी न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह स्थानीय लोककथाओं, प्रेम कहानियों और वीर गाथाओं का जीवंत रूप है।

इसके अलावा, स्थानीय बैंड समूह ढोल-नगाड़ों और शहनाई की धुनों से वातावरण को गुंजायमान करते हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों से आने वाले शिल्पकार और बुनकर अपने हस्तशिल्प, शॉल, ऊनी वस्त्र और आभूषणों का प्रदर्शन करते हैं। इससे न केवल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है, बल्कि स्थानीय कला को वैश्विक पहचान भी प्राप्त होती है।

https://youtu.be/c4PdvROGzTM?si=VpPEoRhxe5USKUlQ

वर्षों से यह उत्सव “लोककला मेले” के रूप में विकसित हो चुका है। यहाँ मंच पर रामलीला, लोक नाटक और लोकगीतों की प्रस्तुतियाँ होती हैं, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करती हैं।

Kullu Dussehra Mela Tourism पर्यटन और आर्थिक प्रभाव

कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन आयोजनों में से एक है। हर साल लाखों की संख्या में देश-विदेश से पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं। इससे होटल, रेस्तरां, टैक्सी सेवाएँ, हस्तशिल्प बाजार और स्थानीय उत्पादों की बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

हिमाचल प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन इस दौरान पर्यटन सुविधाओं को उन्नत बनाते हैं—सड़कें, सुरक्षा व्यवस्था, स्वच्छता और आपात सेवाएँ मजबूत की जाती हैं। यह न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्रीय विकास और रोजगार सृजन का भी प्रमुख अवसर बन गया है।

पर्यटक न केवल उत्सव का आनंद लेते हैं, बल्कि हिमाचल की लोकसंस्कृति, खान-पान, और जीवनशैली को भी अनुभव करते हैं। यह आपसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान “सांस्कृतिक पर्यटन” के रूप में कुल्लू को विश्व मानचित्र पर स्थापित करता है।

Kullu Dussehra Mela Himachal Pradesh कुल्लू दशहरे का आधुनिकीकरण और समय के साथ परिवर्तन

यद्यपि यह पर्व सैकड़ों वर्षों पुराना है, फिर भी समय के साथ इसमें कई बदलाव आए हैं। पहले जहाँ रथ यात्रा पूरी तरह स्थानीय स्वरूप में होती थी, अब उसमें डिजिटल प्रकाश सज्जा, ध्वनि प्रणाली और लाइव प्रसारण जैसे आधुनिक तत्व जुड़ चुके हैं।

राजकीय स्तर पर भी इस आयोजन का विस्तार हुआ है। अब इसमें Kullu Dussehra Mela India अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक दल आमंत्रित किए जाते हैं जो अपनी पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से “ग्लोबल हेरिटेज फेस्टिवल” का रूप प्रदान करते हैं।

Kullu Dussehra Mela

फिर भी, इन आधुनिक परिवर्तनों के बीच मुख्य भावना—श्रद्धा, एकता और भगवान रघुनाथ के प्रति समर्पण—अपरिवर्तित बनी हुई है। स्थानीय जनता अभी भी परंपराओं का सम्मान करते हुए यह सुनिश्चित करती है कि आधुनिकता का प्रभाव धार्मिकता की पवित्रता को प्रभावित न करे।

पर्यावरणीय और सामाजिक उत्तरदायित्व

हाल के वर्षों में कुल्लू दशहरा “ग्रीन फेस्टिवल” के रूप में भी उभर रहा है। प्लास्टिक पर प्रतिबंध, जैविक सजावट, स्थानीय उत्पादों के उपयोग और कचरा प्रबंधन जैसी पहलें अब आयोजन का हिस्सा बन चुकी हैं।

इसके अलावा, सामाजिक संगठनों द्वारा रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच, और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी गतिविधियाँ भी आयोजित की जाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक बन गया है—एक ऐसा अवसर जहाँ धर्म और समाज दोनों की सेवा एक साथ की जाती है।

कुल्लू दशहरा और भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

भारत में दशहरा को विजयदशमी के रूप में “सत्य की असत्य पर विजय” के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। परंतु कुल्लू दशहरा इस त्योहार की भावना को एक अलग ही अर्थ देता है—यह विजय नहीं, बल्कि समर्पण और क्षमा का उत्सव है।

जहाँ देश के अन्य हिस्सों में रावण दहन से अच्छाई की जीत का प्रतीक प्रदर्शित किया जाता है, वहीं कुल्लू Kullu Dussehra Mela में भगवान रघुनाथ की पूजा के माध्यम से यह सिखाया जाता है कि सच्ची विजय मनुष्य के अहंकार पर आत्मनियंत्रण की होती है।

कुल्लू दशहरा भारत की “एकता में विविधता” की अवधारणा को प्रत्यक्ष रूप में प्रदर्शित करता है—जहाँ सैकड़ों देवता, हजारों भक्त, और अनेक परंपराएँ एक ही मंच पर एकजुट होती हैं।

Kullu Dussehra Mela End Date : उत्सव का समापन और लैग वेरना (विदाई)

सातवें दिन कुल्लू दशहरे का समापन होता है जिसे “लैग वेरना” कहा जाता है। इस दिन सभी देवता भगवान रघुनाथ से आशीर्वाद लेकर अपने-अपने गाँवों को लौटते हैं। यह विदाई का क्षण अत्यंत भावुक होता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, देवताओं की पालकियाँ और भक्तों की जयकारों के बीच पूरा मैदान श्रद्धा से भर जाता है।

जैसे ही रथ को विश्राम के लिए ले जाया जाता है, लोग इस विश्वास के साथ घर लौटते हैं कि आने वाला वर्ष शांति, समृद्धि और सौहार्द लेकर आएगा।

 
 
 
 
 
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निष्कर्ष : Kullu Dussehra Mela India

कुल्लू दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है—जहाँ धर्म, संस्कृति, और मानवता का संगम होता है। यह उत्सव सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा में नहीं, बल्कि सेवा, एकता, और विनम्रता में निहित है।

सदियों से यह पर्व कुल्लू घाटी के हृदय में धड़क रहा है, अपनी धरोहर, परंपरा और आध्यात्मिकता के साथ। आज भी जब भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा निकलती है, तो न केवल घाटी, बल्कि पूरे भारत का हृदय भक्ति और गर्व से भर उठता है।

मुख्य अनुष्ठान और समापन Kullu Dussehra Mela, 2025 Himachal Tourism

सबसे प्रमुख आयोजन भगवान रघुनाथ जी की रथ यात्रा है, जिसमें हजारों भक्त पूरे जोश और श्रद्धा के साथ रथ को खींचते हैं। यह यात्रा समुदाय की शक्ति, विनम्रता और भगवान रघुनाथ से गहरे संबंध की प्रतीक मानी जाती है। प्रतिदिन धालपुर मैदान में नई-नई देवी-देवताओं की पालकियाँ पहुँचती हैं, वे विधिपूर्वक भगवान रघुनाथ का अभिवादन करती हैं और इस मिलन से पूरे क्षेत्र में एक अनूठी रंगत और आस्था की झलक बनती है। उत्सव की अंतिम संध्या को रथ यात्रा ब्यास नदी के किनारे पहुँचती है, जहाँ राम की विजय का प्रतीकात्मक मंचन किया जाता है। यहाँ अस्थायी लंका का निर्माण कर उसमें अग्नि दी जाती है, जिससे सप्ताह भर चले उत्सव का समापन अच्छाई की विजय के साथ होता है।

Kullu Dussehra Mela


स्थानीय दृष्टिकोण से देखें तो कुल्लू दशहरा Kullu Dussehra Mela वहाँ के निवासियों के लिए सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि परंपरा और स्मृतियों की समृद्ध धरोहर है। बुजुर्ग आज भी वो दिन याद करते हैं, जब देव-पालकियाँ कई किलोमीटर पैदल चलकर मैदान में पहुँचती थीं और मौसम की चुनौतियाँ भी आस्था को रोक न पाती थीं। अब युवाओं की भागीदारी डिजिटल प्रसारण, रिकार्डिंग और दस्तावेजीकरण जैसे बदलाव लाती जा रही है।


पर्यटकों की नजर में कुल्लू दशहरा हिमाचली संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। सजी-धजी देव-पालकियाँ, लोकनृत्य, ब्यास नदी की गूंज, उत्सव की ऊर्जा और भक्ति की लहर पर्यटकों के अनुभवों में बस जाती है। बहुत से लोग इन सब आकर्षणों के कारण वहाँ बार-बार लौटते हैं।


निष्कर्ष में कहा जाए तो कुल्लू दशहरा Kullu Dussehra Mela हिमाचल की एकता, सहयोग, परंपरा और सांस्कृतिक जीवटता का सर्वोच्च उदाहरण है। राजा की तपस्या से शुरू हुआ यह पर्व अब विश्व मंच पर दक्षिण एशिया की एकता और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बन गया है। धालपुर मैदान में हर साल होने वाली रथ यात्रा, सामूहिक आरती और सांस्कृतिक प्रदर्शनी समय के साथ कभी न टूटने वाली परंपरा बन गई है, जो हिमाचल के विश्वास और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रखती है। आप शिवभूमि भरमौर का ब्लॉग भी लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। 
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